[ Best 50 ]+ Hindi Poem For Class 2 Students | Hindi Kavita for Class 2

Hindi Poem For Class 2: सबसे मुश्किल काम होता है की बच्चो के लिए कविता ढूढ़ना | अगर आप को यह problem होता है तो मैंने इस लेख मे 50 से ज्यादा Hindi Poem For Class 2 लिखा है | इसमें आप अपने बच्चो को पोएम सीखा सकते है या आप इसको अपने बच्चो को लोरी के रूप में सुना सकते है | हमने इसमें हर के कविता के सामने लेख का नाम भी लिखा है आप अपने बच्चो को उस लेखक के बारे में भी बता सकते है |

Hindi Poem For Class 2: सबसे मुश्किल काम होता है की बच्चो के लिए कविता ढूढ़ना | अगर आप को यह problem होता है तो मैंने इस लेख मे 50 से ज्यादा Hindi Poem For Class 2 लिखा है | इसमें आप अपने बच्चो को पोएम सीखा सकते है या आप इसको अपने बच्चो को लोरी के रूप में सुना सकते है | हमने इसमें हर के कविता के सामने लेख का नाम भी लिखा है आप अपने बच्चो को उस लेखक के बारे में भी बता सकते है |

सूरज दादा “लेखक -संगरिया”

सूरज दादा, सूरज दादा,
क्यों इतना गरमाते हो।
हमने तुम्हारा क्या बिगाड़ा,
क्यों इतना गुस्साते हों।

 सोकर उठते जब खटिया से,
तुमको शीश नवाते हैं।
हँसी-खुशी सारा दिन बीते,
ऐसा रोज मनाते हैं। 

दिन भर तुम इतना तपते,
गरम तमाचे जड़ देते हो।
पशु-पक्षी व जीव जगत भी,
व्याकुल सबको कर देते हो। 

वर्षा का जब मौसम आता,
ओट बादलों की ले लेते हो।
उमड़-घुमड़ जब वर्षा होती,
आसमान में खो जाते हो।

 जाड़े में तुम बच्चे बन,
सबको प्यारे लगते हो।
हम भी बैठ खुले आँगन में,
तुमसे बाते करते हैं।

 शाम ढले तुम चल देते हो,
हम कमरों में छिप जाते हैं।
ओढ़ रजाई ऊपर से हम,
दुबक बिस्तरों में जाते हैं।

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प्यारी पुस्तक “लेखक-गोविन्द भारद्वाज”

प्यारी-प्यारी पुस्तक है,
देती दिल पे दस्तक है।

अक्षर-अक्षर ज्ञान भरा है,
अशिक्षा का तिमिर हरा है।
ऊँचा करती मस्तक है,
प्यारी-प्यारी पुस्तक है।

जीवन का निर्माण करे,
जन-जन का कल्याण करे।
करती सेवा अब तक है,
प्यारी-प्यारी पुस्तक है।

चित्र सुंदर इसमें आते,
बालमन को ये लुभाते।
ये भरती ज्ञान अक्षत है,
प्यारी-प्यारी पुस्तक है।

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आओ सीखें “लेखक -डॉ. प्रीति प्रवीण खरे”

 क से कविता पढ़ना,
ख से खाना खाना।
ग से गुस्सा छोड़ो,
घ से घमंड तोड़ो।
ड. तो खाली रहता।।

च से चाची भीगी,
छ से छतरी गीली।
ज से जूता पहना,
झ से झरना बहता।
इयाँ- तो खाली कहता।।

ट से टेसू खिलता,
ठ से ठंडा लगता।
ड से डमरू बजता,
ढ से ढक्कन खुलता।
ण से तो कण होता।।

त से तितली उड़ती,
थ से थाली सजती।
द से दादी प्यारी,
ध से धूप न्यारी।
न से नाचे नानी।।

प से पल ढलता है,
फ फल लगता है।
ब से बकरी चरती है,
भ से भगदड़ मचती है।
म से मक्खी उड़ती है।।

य से यान उड़ेगा,
र से रथ चलेगा।
ल से लड़की बोलती,
व से वन बढ़ेगा।
श से शीश उठेगा।।

स से सरगम बोले,
ष से षठकोण डोले।
ह से हाथी भोले,
क्ष से क्षमा की वाणी।
त्र से त्रिशूल धारी।।

ज्ञ से बच्चे ज्ञानी,
बोले प्यार की बानी।
अक्षर का खेल निराला,
वर्ण की है यह माला।
झटपट इसको रट डाला।।

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मीठे आम “लेखक -डॉ. चक्रधर नलिन”

सुन्दर, सुन्दर मीठे आम,
अच्छे, अच्छे, प्यारे आम।
नहीं आम-सा कोई फल,
खाओ इन्हें न छोड़ो कल।

पके, गले, मुस्काते आम,
मिलते ढ़ेरों सस्ते आम।
लगड़ा, सेंदुरिया-मद्रासी,
बम्बइया, तुकमी, बनारसी।

रस से भरे दशहरी आम,
खाओ अभी छोड़ सब काम।
बुला रहे आमों के बाग,
बीने इनको तड़के जाग।

महकें बहुत सफेद आम,
बच्चे देख रहे जी थाम।
कोयल कूके अम्बुआ डाल,
आम तोड़कर धर दें पाल।

खाते नित जो प्यारे आम,
वे पाते फल चारों धाम।
कौन नहीं जो खाता आम,
किसे नहीं है भाता आम।

तृप्ति और सुख मिले तमाम,
तेरे सुने हजारों नाम।
सुन्दर, सुन्दर मीठे आम,
अच्छे, अच्छे प्यारे आम।

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प्यारे बच्चे “लेखक  -कैलाश त्रिपाठी”

कितने भोले कितने अच्छे,
सुखद मनोहर प्यारे बच्चे।
मीठी वाणी सहज सरल है,
इनसे सबको प्यार प्रबल है।

नहीं बनावट द्वेष जानते,
प्यार और अपनत्व मानते।
फूलों जैसा कोमल तन है,
नहीं कलुषता निर्मल मन है।

जहाँ कहीं यह मौका पाते,
लगें खेलने धूम मचाते।
करते सब हैं इन्हें दुलार,
लगता बचपन सुखद अपार।

रहती अधर मधुर मुस्कान,
बनते यही राष्ट्र की शान।
भेद-भाव सब दूर भगाते,
जन मन में खुशहाली लाते।

मन से सब मतभेद भुलाते,
सदा सभी को मीत बनाते।

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बन्दर मामा “लेखक  – अरुण यादव”

रौब से निकले बन्दर मामा,
आज सिलाऊं मस्त पैजामा।

मल-मल कर उसको धुलवाऊं,
पानी छिड़क इस्त्री करवाऊं।

सेंट लगा ससुराल जाऊं,
ताम-झाम अपना दिखलाऊं।

रात तक पहुंचे ससुराल,
सबने पूछे उनके हाल।

सासू ने पकवान बनाए,
मिल बांट सबने खाए।

सुबह बीवी की करा विदाई,
शाम को घर लौट आए भाई।

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बचपन “लेखक – गोपाल कौशल”

बचपन के दिन,
कितने हैं हसीन।
मजा नहीं आए,
दोस्तों के बिन।।

नीर में ढूँढे रेत,
खेलते ऐसे खेल।
कभी मिट्टी आए,
कभी हाथ आए रेत॥

नीर में देख छवि,
भरें किलकारी।
घर बनाने की कर,
रहे नन्हें तैयारी॥
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तितली ” लेखक  – प्रीती कुमारी”

तितली रानी तितली रानी,
फूलों की हो तुम महारानी।
फूलों में छिप जाती हो,
सबके मन को भाती हो।

कभी ना मेरे घर आती हो,
फूलों पर मंडराती हो।
फूलों का रस पी जाती हो,
कितना सुन्दर रूप तुम्हारा।

सबके मन को भाती हो,
कितनी भी कर ले कोशिश,
पर हाथ किसी के न आती हो।
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शिक्षक “लेखक – अंजली”

शिक्षक हमें पढ़ाते है।
योग्य हमें बनाता है।
नई सीख हमें सिखाते है।
दुःख सुख में साथ निभाते है।

उपयोगी ज्ञान दिलाते हैं।
स्वादिष्ट भोजन हमें खिलाते है।
पोशाक, जूता और
मोजा, बैग दिलाते है।

हफ्ते हफ्ते में दूध
और फल खिलाते है।
शिक्षक हमें पढ़ाते है।
योग्य हमें बनाते है।
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मुन्ना बोला “लेखक -प्रदीप कुमार गोंडा”

मुन्ना बोला दीदी से,
दीदी ये बतलाओ तुम।
कैसे नभ में उड़ते पक्षी,
मुझको भी समझाओ तुम।

दीदी बोली मुन्ने से,
सब चिड़ियों में लगे।
तभी हवा में उड़ते हैं,
वे प्यारे पंखों के संग।

मुन्ना बोला दीदी से,
लगे नहीं क्यों पंख हमें।
जिस से उड़कर आसमान,
सैर करें हम बच्चे सारे।

दीदी बोली मुन्ने से,
छेड़ा करते हो, पक्षी को।
इसीलिए है पंख नहीं,
नभ में छू न सको उसे।
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चांद “लेखक  -सतीश उपाध्याय”

रोज रात में आता चांद,
सबको बड़ा लुभाता चांद।
चुपके-चुपके जाने कब,
सपनों में आ जाता चांद।

गोरा-गोरा, दूध नहाया,
सुंदर रूप दिखाता चांद।
आकर पास, कमी हमारे,
लोरी हमें सुनाता चांद।

देखो कितना रूप बदलता,
रोटी भी बन जाता चांद।
शरमा जाए कभी-कभी तो,
बादल में छुप जाता चांद।

दूर-दूर से हमें, निहारे,
हाथ नहीं, क्यों आता चांद।
किसने मामा इसे बनाया,
हम को नहीं बताता चांद।

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बन्दर ने खूब बनाया “लेखक  -हरिन्दर सिंह गोगना”

अप्रैल फूल के दिन,
बन्दर के आया मन में।
गधे को बनाता हूँ ‘फूल’
वही मूर्ख है वन में।

गधे को लगाया फोन,
कहा”आज घर आना।
मेरा जन्म दिन है आज,
पकवान बने हैं नाना।

“सुन कर गधा गदगद हुआ,
मुँह से टपकी लार।
पहना कोट, बाँधी टाई,
अच्छे से हुआ तैयार।

पहुँचा जब बन्दर के घर,
दरवाजे पर ताला पाया।
अब गधे को समझ आया,
बन्दर ने ‘फूल’ बनाया।
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फूल “लेखक  -चानी एरी”

बाग-बाग में खिलते फूल,
सदा बिहंसते रहते फूल।
महक भरी रहती है इनमे,
सबको अच्छे लगते फूल।

कांटों का कोई मित्र नहीं,
कांटों में ही खिलते फूल।
अनगिन गुण इनमें होने से,
शीष चढ़ाए जाते फूल।

फूल सिखाते हंसते रहना,
हर मौसम में खिलते फूल।
फूल सिखाते भाव जगाना,
भौरे गाते गुनगुन गाना।

ऐसे प्यारे होते फूल,
कभी नहीं हैं रोते फूल।
मित्र हमारे होते फूल,
बाग-बाग में खिलते फूल।
सदा बिहंसते रहते फूल।
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बच्चे “लेखक  -हरिन्दर सिंह गोगना”

द्वेष, कपट, छल से अनजान,
चंचल, मासूम, हठी, नादान।

बच्चे होते कितने प्यारे,
सबकी होते आंख के तारे।

भेदभाव न जानें बच्चे,
तभी तो लगते हैं अच्छे।

फिक्र गमों से दूर रहते,
अपनी मस्ती में चूर रहते।
बच्चों की हर एक अदा,
होती है सबसे जुदा।

धरती पर है स्वर्ग वहाँ,
मुस्कुराता है बचपन जहाँ।

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चाचाजी की कार “लेखक  -राजेंद्र श्रीवास्तव”

चिंटू चाचाजी की कार,
चलती चींटी की रफ्तार।
बीचोंबीच भरे बाजार,
रुकती खाकर झटके चार।

चिंटू चाचा तब थक हार,
लेकर गुस्सा और गुबार।
वापस आ जाते मन मार,
वहीं छोड़ कर अपनी कार।

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स्कूल की बस आयी,
पीली चदर ओढ़ के आयी।

जब टी-टी पी-पी करती,
सब बच्चे खींचे चले आते।

रोज घर से स्कूल, स्कूल से घर,
हमें सुरक्षित पहुंचाती।

मम्मी पापा हमें बस में बिठाते,
बस में बैठते ही दोस्त यार मिल जाते।

ड्राइवर दादू बस चलाते,
ब्रेकर आए तो सब उछल जाते।

फिर हम सब शोर मचाते,
खुशी खुशी हम बस में बैठ कर जाते।

देखो देखो स्कूल की बस आयी,
पीली चदर ओढ़ कर आयी।

– नरेंद्र वर्मा

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उठो कन्हैया
जागो भैया
पूरब में सूरज उगाया
अंधियारे को दूर भगाया।

सदा जरूरी
नींद भी पूरी
भोर में सोना गलत बताया।

मां ने गोदी ले दुलराया
चिड़िया चहकी
बगिया महकी
फूलों का चेहरा मुस्कुराया।

भंवरों ने गुनगुन गाया
पवन सुगंधी मंदी मंदी
भर लाई सेहत की माया
तन को छूती मन हरषाया।

भोर में जगना
रोज घूमना
सेहत का यह राज कहाया
दादाजी ने मंत्र बताया।

उठो कन्हैया
जागो भैया
पूरब में सूरज उगाया
अंधियारे को दूर भगाया।

– विनीत

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